Thursday, March 20, 2014

पकड़ा गया इंडिया टीवी के रजत शर्मा का सफ़ेद झूठ

पकड़ा गया इंडिया टीवी के रजत शर्मा का सफ़ेद झूठ

इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा रजत शर्मा 14 मार्च को प्रसारित 9 बजे के कार्यक्रम 'आज की बात' में अरविंद केजरीवाल के कई पेंच खोलने की कोशिश की। बुखार होने और बीमार होने का हवाला देते हुए रजत शर्मा ने पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करने के लिये 14 मार्च का कार्यक्रम एंकर किया। लेकिन कार्यक्रम के अंत में रजत शर्मा ने जो दावा किया था अब वो सारे दावे सवालों के घेरे में है। इस कार्यक्रम के अंत में रजत शर्मा ने अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को संबोधित करते हुए कहा कि "केजरीवाल जी, आपको पब्लिक लाइफ में आये हुये चार दिन हुये हैं। संघर्ष क्या होता है, ये आपको नहीं मालूम है। लेकिन अपनी बात कहने की आजादी के लिये मैंने इमरजेंसी के ज़माने में जेल काटी है। उस ज़माने में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश था, आज़ाद अखबार निकालने के लिये पुलिस मुझे पकड़ के ले गई और मैंने मार खाई। दो दिन तक थाने में टार्चर सहा और अगर हिम्मत से सच कहने के लिये सौ बार और ज़ेल जाना पड़ेगा तो मैं तैयार हूं क्योंकि देश की जनता मेरे साथ है।" गौरतलब हो कि रजत शर्मा ने अपने कार्यक्रम में इस तरह के दावे किये हैं।
दरअसल 57 वर्षीय रजत शर्मा का जन्म 30 अप्रैल 1956 में हुआ था। इन्होने जिस इमरजेंसी के ज़माने में जेल काटने की बात कही है, उसकी हक़ीकत ये है कि रजत शर्मा ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ही 1982 के आसपास की थी। आपातकाल 25 जून, 1975 को लगाया गया था और 21 मार्च 1977 तक लागू था। यहाँ गौर करने की बात ये है कि जिस वक़्त के बारे में रजत शर्मा एक स्वतंत्र अखबार निकालने की बात करते हैं उस वक़्त इनकी उम्र मात्र 19 साल की थी। अब यहाँ ज़रा सोचने वाली बात ये है कि अगर वो सिर्फ आंदोलन में जेल जाने की बात कहते तो एक बार उनकी बातों पर विश्वास किया भी जा सकता था। लेकिन 19 साल की उम्र में अखबार चलाने की बात ज़रा अतिसंयोक्ति सी लग रही है क्यूंकि उन्होंने खुद अपने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि उनका पत्रकारिता कैरियर 1982 में शुरू हुआ है और उसी वक़्त उन्होंने अपना पहला लेख लिखा था, फिर 1975 में वो अखबार कैसे निकालने रहे थे? रजत शर्मा के ही पुराने इंटरव्यू के अनुसार 1982 में पहली बार उन्होंने ऑनलुकर में अपना पहला लेख लिखा था।
गौरतलब हो कि 11 अप्रैल 2009 को बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार के अंश में या विकिपीडिया पर इसकी सत्यता की जांच कर सकते हैं। उनका कहना था कि "पत्रकार बनने का कभी नहीं सोचा था। बस सोचा था कि एम कॉम के बाद बैंक में नौकरी करूँगा और घर का भार कम करूँगा। एम कॉम के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहा था तभी मेरी मुलाक़ात जयनंदा ठाकुर से हुई। उन्हें रिसर्चर की ज़रूरत थी। उन्होंने इसके लिए मुझे चार सौ रुपये महीने देने का वादा किया। एक दिन मैंने उनसे कहा कि जितनी सूचनाएँ मैं देता हूँ, वो सब तो आप इस्तेमाल नहीं करते। क्या मैं इसे इस्तेमाल कर सकता हूँ? फिर मैंने एक लेख ऑनलुकर पत्रिका को भेजा और उन्होंने इसके लिए मुझे 600 रुपये दिए। ये बात जुलाई 1982 की होगी। ऑनलुकर के एडीटर डीएम सिल्वेरा ने मुझे पत्रिका में बतौर ट्रेनी का ऑफ़र दिया। इसे आप मेरी किस्मत ही कह सकते हैं। 1982 के आखिर में उन्होंने मुझे संवाददाता बना दिया, फिर 1984 में दिल्ली का ब्यूरो चीफ़।"
अब यहाँ ये रिसर्च का विषय है कि रजत शर्मा ने अपने पुराने इंटरव्यू में झूठ बोला था कि उनका पत्रकारिता कैरियर सन 1982 में शुरू हुआ था या फिर अब बोल रहे हैं कि वो 1975 में आपातकाल के दौरान उनके आज़ाद अखबार चलाने के लिए उन्हें जेल भेजा गया था। वैसे 'आप की अदालत' लगा कर मशहूर हुये रजत शर्मा अब 'आप' की अदालत के कटघरे में हैं। जाहिर है, केजरीवाल को झूठा बताने की कोशिश में रजत शर्मा ऐसी बात कह गये हैं, जिसे साबित करना उनके लिये मुश्किल होगा।

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Wednesday, March 19, 2014

कांग्रेस और बीजेपी दोनो ही सेम है ....

कांग्रेस और बीजेपी दोनो ही सेम है ....
 १ दोनों मिलकर दारू बाट सकते हैं। 
२ दोनों भ्रस्टाचार कर सकते हैं।
 ३ दोनों दागियों को टिकिट दे सकते हैं। 
४. दोनों RTI के दायरे में नहीं आना चाहते।
 ५ दोनों चंदे का हिसाब नहीं देना चाहते।
 ६. दोनों लाल बत्ती की गाड़ी चाहते हैं। 
७. दोनों आम आदमी को हराना चाहते हैं।। 
८. दोनों सिर्फ सत्ता चाहते हैं।
 ९. दोनों सांप्रदायिक है l
 १०. दोनों सख्त लोकपाल के विरोध में है l 
 ११. दोनों सीबीआई को स्वतंत्र करने के पक्ष में नहीं है ll तो दोनों मिलकर सरकार क्यों नहीं बना सकते
ये भी ठीक है...!
एक पीएम उम्मीदवार तो दूसरा सबसे सशक्त पीएम मैटीरियल...!!
लड़ा दो बनारस में आमने सामने से.....
जो जीते , उसे पीएम बनाने और दिल से मानने की शर्त के साथ....,
बनारस की आम जनता पर फैसला छोड़ते हुए......
क्यों....?
#जय जनलोकपाल..!-

आम आदमी पार्टी की उपलब्धि -
पहली बार हम को पता चला की मीडिया भी बिकाऊ होता है !
पहली बार हम को पता चला की कांग्रेस और बीजेपी अदानी और
अम्बानी की दुकान है!i
पहली बार हम को पता चला की कितने सारे क्रिमनल्स और
करप्ट्स सिस्टम में बैठे हैं !
पहली बार हम को पता चला की हमारे वोट की अहमियत क्या है!
पहली बार हम को पता चला की धर्म के इलावा भी मुद्दे हैं,जिस
पर अवाम एक जुट हो सकती है
पहली बार हम को पता चला की कोई सख्स सी.एम्.बन कर
महज़ ४९ दिन में एक कानून के लिए कुर्सी झोड़ देता है!
पहली बार हम को पता चला की ४९ दिन में सी.एम्.बन कर इतने
काम कर दिए जो ४९ साल सत्ता में भी रह कर नहीं कर सके !
पहली बार अवाम इकठा है ईमानदार राजनीत के लिए!
पहली बार भारत जागा है!
यह है आप का इफ़ेक्ट !!

Sunday, March 16, 2014

Question of Arvind Kejariwal

केजरीवाल ने कहा, मोदी जी चाय पिला देते तो क्या बिगड़ जाता? इतना क्यों डरते हैं मोदी जी मेरे से?
केजरीवाल: मोदी हेलिकॉप्टर से आते हैं, स्टेज पर उतरते हैं, भाषण देते हैं और निकल जाते हैं। यही हाल राहुल का है।
सफेद झूठ बोलते हैं मोदी जी। खुलेआम झूठ बोलते हैं मोदी जी और मीडियावाले उसे दिखाते
केजरीवाल ने कहा, मोदी और राहुल को बताना पड़ेगा कि 1947 में देश आजाद हो गया है।
केजरीवाल: मुकेश अंबानी को क्यों दिए गैस के कुएं?बीजेपी के अलावा कांग्रेस ने भी पैसे कमाए। 1 डॉलर की चीज 4 डॉलर में दे दी।400 पर्सेंट प्रॉफिट
मोदी हेलिकॉप्टर से आते हैं, स्टेज पर उतरते हैं, भाषण देते हैं और निकल जाते हैं। यही हाल राहुल का है।
केजरीवाल: कर्नाटक के वीरप्पा मोइली ने चुनाव से कुछ पहले बदमाशी करके गैस के दाम 8 डॉलर कर दिए। 1 अप्रैल से गैस के दाम बढ़े को महंगाई होगी
केजरीवाल ने कहा, अगर एक मुख्यमंत्री किसी राज्य के सीएम से मिलना चाहे तो समय नहीं मिलता, 5 किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया।
जो काम हरियाणा में वाड्रा करते हैं, वही गुजरात में मोदी जी करते हैं। दोनों में क्या फर्क है? -
दोस्तों कांग्रेस की जगह बीजेपी पार्टी बदलने से हमारी ज़िन्दगी नहीं बदलनी वाली केवल चेहरे बदलेंगे ; केजरीवाल
केजरीवाल ने कहा, मेरे बारे में दिखाते हैं कि इतने बेडरूम का मकान ले रहे हैं। मोदी जी का झूठ क्यों नहीं दिखाते?
केजरीवाल ने कहा, सफेद झूठ बोलते हैं मोदी जी। खुलेआम झूठ बोलते हैं मोदी जी और मीडियावाले उसे दिखाते हैं।
केजरीवाल ने कहा, मोदी जी के राज में 800 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
केजरीवाल ने कहा, जो काम हरियाणा में वाड्रा करते हैं, वही गुजरात में मोदी जी करते हैं। दोनों में क्या फर्क है?
अंग्रेजों ने 200 सालों में उतना नहीं लूटी, जितना 10 सालों में राहुल, सोनिया और मनमोहन की सरकार ने घोटाला किया: केजरीवाल
केजरीवाल ने कहा, गुजरात के किसान खून के आंसू रो रहे हैं। किसानों का आरोप है कि हमारी जमीन सरकार ने कौड़ियों के भाव छीन ली।
अमित शाह इस देश के गृह मंत्री बन जाएंगे तो देश में किन-किन औरतों की जासूसी करवाएंगे: केजरीवाल
मैं गुजरात का विकास देखने सीखने गया था जो देखा वो शॉकिंग था सरकार में एक भी काम बिना पैसे के नहीं होता है ; केजरीवाल
केजरीवाल ने कहा, बाबू भाई बुखारिया को माइनिंग में कोर्ट से तीन साल की सजा हो चुकी है और अभी भी वह मंत्री हैं। क्या मजबूरी है मोदीजी की।
केजरीवाल ने कहा, गुजरात जाकर मैंने देखा कि वहां एक भी काम बिना पैसे का नहीं होता है। चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है।
अंग्रेजों ने 200 सालों में उतना नहीं लूटी, जितना 10 सालों में राहुल, सोनिया और मनमोहन की सरकार ने घोटाला किया: केजरीवाल
केजरीवाल ने कर्नाटक से 6 नेताओं को दागी बताया। केजरीवाल ने कहा, कर्नाटक में भ्रष्टाचार का बोलबाला। देशभर में लोग बीजेपी, कांग्रेस से दुखी।
केजरीवाल ने कहा, मोदी जी दो सीटों से लड़ने पर विचार कर रहे हैं। उन्हें बहादुरी दिखाना चाहिए और एक सीट पर चुनाव लड़ना चाहिए।

Thursday, March 13, 2014

मोदी के 17 घोटाले और मोदी के राष्ट्रवाद का सच...

अरविंद केजरीवाल ही है जिसने मोदी को सेफ सीट ढूंढने पर मजबूर कर दिया...अरविंद केजरीवाल ही है जिसने मोदी के झूठे विकास के दावों की पोल खोलकर रख दी...

इंटरव्यू से भागता है मोदी...सवालों के जवाब देने से भागता है मोदी...अपने भ्रष्टाचार पर बहस करने से भागता है मोदी !!! मोदी के 17 घोटाले...ये 17 घोटाले ऐसे हैं जिन पर मोदी लोकायुक्त की जाँच नहीं चाहते...राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले मोदी ने भारतीय वायुसेना को सस्ती ज़मीन ना देकर एक रिअल स्टेट डीवेलपर को सस्ती ज़मीन दे दी...पढ़िए मोदी के 17 घोटाले और मोदी के राष्ट्रवाद का सच...

✪Land for Nano plant at low rate
The state government allotted 1100 acres of land to Tata Motors Ltd (TML) to set up the Nano plant near Sanand. The land was allotted allegedly at Rs900 per square metre while its market rate was around Rs10,000 per square metre. Simply put, the government gave Tata Motors total monetary benefit of Rs33,000 crore.

✪Land sold cheap to Adani Group
Land was allotted to Adani Group for the Mundra Port & Mundra Special Economic Zone (SEZ) at Re1 per square metre. This is grossly lower than the market rate.

✪Cheap land for ind, not for airforce
The Gujarat government allotted 3,76,561 square metre of land to real estate developer K Raheja at Rs470 per square metre, while the South-West Air Command (SWAC) was asked to pay Rs1100 per square metre for 4,04,700 square metre land.

✪Agricultuure University land allotted for hotel
State government allotted 65,000 square metres of land belonging to Navsari Agriculture University in Surat to Chatrala Indian Hotel Group for a hotel project despite objection from the institute. This deal was allegedly brokered by the chief minister through his office causing a loss of Rs426 crore.

✪Border land for chemical firms
A huge plot of land near the Pakistan border was allotted to salt chemical companies said to be close to BJP leader Venkaiah Naidu.

✪Essar Group's encroachment
State government has allotted 2.08 lakh square metres of land to Essar Steel. Part of the disputed land is CRZ and forest land that cannot be allotted as per Supreme Court guidelines.

✪Land given to Bharat Hotel
Prime land was allotted to Bharat Hotels without auction on Sarkhej-Gandhinagar Highway in Ahmedabad. The company has been allotted 25,724 square metre land.

✪Corruption in allotment of lakes
State government, in 2008, awarded contracts for fishing activities in 38 lakes without inviting any tenders; bidders were ready to pay Rs25 lakh per lake.

✪Land given to L&T
Larson & Toubro (L&T) was allotted 80 hectare land at Hazira at the rate of Re1 per square metre.

✪Land allotted to other industries
Instead of auctioning prime land in the major cities of the state, the Gujarat government had allotted the land to some industries and industrialists who had signed MoUs in the five editions of VGGIS.

✪Cattle feed fraud
The Gujarat government had purchased cattle feed from a blacklisted company at Rs240 per 5 kg whereas the market rate is just Rs120 to Rs140 per 5 kg.

✪Scam in Anganwadi centres
Two bidders apparently formed a cartel and bid for supplying supplementary Nutrition Extruded Fortified Blended Food (EFBF) to Anganwadi centres of the state. One company bid for three zones, while the other for only two. Guidelines were violated, causing the state exchequer a loss of Rs92 crore.

✪GSPC
Despite an investment of Rs4933.50 crore, GSPC has been able to earn only Rs290 crore from the 13 out of 51 blocks of oil and gas discovered by the company. Contractual relations of Geo-Global and GSPC deserve investigation since Geo-Global is to be hired for a higher fee, above profit-sharing.

✪Luxury aircraft used by CM
Instead of using commercial flights or state-owned aircraft and helicopter, chief minister Narendra Modi had used private luxury aircraft for around 200 trips in five years. The cost had been borne by the beneficiary industries.

✪Rs500 crore SSY scam
The Rs6237.33 crore Sujalam Sufalam Yojana (SSY) announced in 2003 was to be completed by 2005 but it is still not completed. Public accounts committee of Gujarat assembly unanimously prepared a report indicating a scam of over Rs500 crore which was not tabled.

✪Indigold Refinery land scam
Around 36.25 acre farmland in Kutch district was purchased and sold in violation of all norms by Indigold Refinery Ltd.

✪Swan Energy
49% of the shares of Pipavav Power Station of GSPC were sold to Swan Energy without inviting any tenders.

✪अरविंद केजरीवाल ने इंडिया टुडे कॉनक्‍लेव में कहा, 'भ्रष्टाचार के मामले में यूपीए सरकार ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए है. यूपीए तो चली जाएगी. कांग्रेस खत्म है. पिछले एक साल से देश के साथ बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है. बीजेपी वाले और मीडिया का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने पर तुला है...हम 48 घंटे के गुजरात दौरे पर गए. देखकर बहुत दुखा हुआ. भ्रष्टाचार के बिना गुजरात में कोई काम नहीं हो रहा. सरकारी दफ्तर हो या फिर नौकरी पाने का मसला, हर जगह भ्रष्टाचार है.'

✪अरविंद केजरीवाल ने कहा कि 2002 के बाद 12 दंगे हुए हैं गुजरात में !!! अरविंद केजरीवाल ने कहा, 'दंगा होते नहीं हैं, दंगे करवाए जाते हैं...इसमें किसी न किसी राजनीतिक पार्टी का हाथ होता है...एक नेता को सजा दे दो...सारे दंगें बंद हो जाएंगे !!!

✪अरविंद केजरीवाल : सुरक्षा की बात करते हैं...मैं दो दिन गुजरात में था...तीन बार हमले हुए हम पर...जो मुख्यमंत्री दूसरे मुख्यमंत्री की रक्षा नहीं कर सकता...वो गुजरात के लोगों को सुरक्षा क्या देगा...शुक्र है मेरा एनकाउंटर नहीं हुआ !!!

✪अरविंद केजरीवाल ने कहा कि अंबानी परिवार के दामाद गुजरात सरकार में मंत्री है... अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल गुजरात सरकार के मंत्री हैं !!!

✪गुजरात को मोदी नहीं चला रहे, अंबानी और अडानी चला रहे हैं. वहां हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं चलती. मोदी जी जवाब क्यों नहीं देते. मोदी जी मीडिया के सवाल नहीं लेते : अरविंद केजरीवाल

✪इंडिया टुडे कॉनक्‍लेव में अरविंद केजरीवाल ने कहा, 'मोदी जी की कैबिनेट में ही भ्रष्टाचारी बैठे हैं. वहां किसानों की हालत बेहद खराब है. अगर देश के किसानों को इसके बारे में पता चले तो वो बीजेपी को वोट नहीं देंगे. किसानों से सस्ती दर में जमीन खरीदकर अडानी ग्रुप को कौड़ियों के भाव में जमीन दे दी गई. चरणका गांव में सोलर प्रोजेक्ट के नाम पर बीजेपी के विधायक ने जमीन हथिया ली. तो मोदी जी और रॉबर्ट वाड्रा में क्या फर्क. कुछ ऐसा ही काम तो हरियाणा में भी हो रहा है. वहां पर किसानों ने बताया कि टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए 29000 करोड़ की सब्सिडी दी गई. किसान यही कहता है हमसे क्या गलती हो गई.'

✪गुजरात के अपने दौरे के बारे में बोलते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा, 'प्राइवेट हेल्थ सेंटर पर ताले लगे हुए हैं. मैं सामी के रेफरल अस्पताल में गया, वहां दो डॉक्टर थे एक नर्स थी. अस्पताल में कोई दवाई नहीं थी. मालिया गांव में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में दो डॉक्टर हैं. लोग कहते हैं इनमें से एक आता है और एक हफ्ते में कभी-कभार. ये हेल्थ का हाल है. तालुका में 618 स्टूडेंट का कॉलेज है, सिर्फ 2 टीचर है. एक-एक शिक्षक सैलरी 5300 रुपये महीने में हैं. इतने पैसे में घर कैसे चलाया जा सकता है. ये वहां पर शिक्षा का हाल है. मोदी जी के आंकड़ें भी झूठ बोलते हैं. मोदी जी ने कृषि में 11 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की. कृषि में -01.18 फीसदी का दर है. कहा गया कि 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगे नहीं हुए, जबकि 6 दंगे हुए. मेहसाणा में लघु उद्योग बंद हो गए, कुल 147 फैक्ट्री बंद हो गईं. क्या सिर्फ अंबानी और अडानी का विकास होगा. अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को उन्होंने गैस, पेट्रोल और माइनिंग का मंत्री बना दिया.

✪अरविंद केजरीवाल : गुजरात में 60 के बाद बसे लोगों से जमीन छीनी जा रही है...कच्छ में सिखों से जमीन छीनी जा रही है...पांच हजार करोड़ रुपये की जमीन जनता से छीनी जा रही है !!!

✪अरविंद केजरीवाल : मुझे कांग्रेस का एजेंट कहा जाता है. पर ये भी जान लो कि रॉबर्ट वाड्रा का खुलासा आम आदमी पार्टी ने किया था. बीजेपी वालों के पास ये कागजात थे. पर वे चुप रहे. दोनों पार्टी के बीच सांठगांठ है, दोनों ने सोचा कि हम अपने दामाद को बचाते हैं तुम अपने बचाओ !!!

✪हमने दिल्ली में भ्रष्टाचार कम किया...लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार नहीं खत्म हो सकता...मैं ऐसा नहीं मानता...कड़े कदम और दोषियों को सजा देकर भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है...हम जनलोकपाल लेकर आ रहे थे, पर बीजेपी-कांग्रेस ने उसे रोक दिया - अरविंद केजरीवाल

आपकी आवाज़: लोकतंत्र के हितैसी या राजनितिक पार्टियों के दलाल!

आपकी आवाज़: लोकतंत्र के हितैसी या राजनितिक पार्टियों के दलाल!

लोकतंत्र के हितैसी या राजनितिक पार्टियों के दलाल!

Letter to Punjab Kesari.

पंजाब केसरी ने आदमी पाटॅी को लेकर पिछले एक सप्ताह की हेडलाइन्स नीचे लिख रहा हूँ
-लोकतंत्र के भक्षक नही रक्षक बने।
-आप नेता के मुँह पर स्याही पोती। हिन्दूवादी संगठन वीरसेना का आदमी था न कि आदमी पार्टी का।
-अहमदाबाद में केजरी का प्रोग्राम फ्लाप, 50-60 लोग आये।
-केजरीवाल की जुर्रत!
-आप नेताओं में घमासान।
-मोदी का रथ नही रुकेगा!
-मुम्बई में आप समर्थकों और केजरीवाल  ने मचाया कोहराम।


                                               ये केवल हेडलाइन्स है, इनके अन्दर पढ़ने पर यह स्टोरी पूरी तरह से भाजपा या मोदी जी के पक्ष में लिखी हुयी होती है।  तब लोकतंत्र के चौथे स्तमभ पर शक होता है। और इस जमात मे आप अकेले नही है। इसमे Zee news group, India news & Times Now भी शामिल है। मसला यही नही ख़त्म हो जाता है। आखि़र इसके पीछे क्या कारण है। कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। क्या इसके पीछे आप और भाजपा नेताओं मसलन राजनाथ जी, विजय गोयल या अरुण जेटली के साथ मित्रवत व्यवहार या फिर आपके माता श्री किरण चोपड़ा और सुषमा स्वराज जी के साथ पारिवारिक रिश्ते क्योंकि सुषमी जी को आपके फार्महाउस पर करवाचौथ मनाते हुए तस्वीरों में देखा गया है।
Zee news का भाजपा founder memeber है एकतरफ़ा रिपौटिग। जैसे Zee news ने कल हेडलाइंस चलाई "आम आदमी पार्टी समर्थकों की मुम्बई में गुण्डा-गर्दी" सरासर ग़लत न्यूज़। हॅा, अरविन्द से मिलने की चाह में, अफरा-तफरी ज़रुर मची और मेटल डिटेक्टर को नुकसान पहुचा।
रही बात India News की, India news के डायरेक्टर दीपक चौरसिया को बढ़ाने में आडवानी जी का हाथ है जब वो DD News के लिए काम करते थे। कुछ दिन क्राँग्रेसी चैनल होने का आरोप लगा। लेकिन जब से India news के मालिक विनोद शर्मा ने Congress party छोड़ नमो-नमो करना शरु किया है इंडिया न्यूज़ ने भी मोदी का गुणगान और आम आदमी पार्टी को दुष्प्रचार करना शुरु कर दिया है।

मैं इसे आप लोगों की कमी नही मानता। विश्व के तथाकथित सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया को लेकर कोई भी एक ऎसी जिम्मेदार संस्था नही है जो इन सब चीजों पर स्वत: संज्ञान लेकर रोक लगा सके। तब सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है आप जैसे मीडिया हाउस चलाने वाले लोग लोकतंत्र के हित में काम नही, बल्कि कुछ राजनितिक पार्टियों और नेताओं की दलाली का काम करते हो। और अरविन्द केजरीवाल की यह बात पूरी तरह सही है कि " पूरे देश में मोदी की लहर चल रही है, हवा चल रही है" यह आप जैसे मीडिया हाउसेज़ के द्नवारी फैलाया गया महज एक षडयंत्र है। अगर एैसा होता तो फिर, बातों और विचारधारा के तौर पर दोगली पार्टियों से हाथ नही मिलाते जैसे लोजपा, जस्टिस पार्टी और मनसे।
क्या बीजेपी और मोदी ये बतायेंगें राजठाकरे से हाथ मिलाने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के ग़रीब मजदूरों, रेहडी- पटरी वालों और रिक्शा चालकों को न्याय कैसे मिलेगा।

मोदी एक तानाशाह प्रवति का आदमी है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक सभी बडे़ नेताओं को अकेला खा गया मसलन केशूभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, आडवानी जी, अरुन जेटली, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज। भारतीय जनता पार्टी का सत्ता में आना और मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश और संविधान के मूल भावना के खिलाफ़ होगा।मोदी को इस देश  का प्रधानमंत्री कभी नही बनना चाहिये। अगर NDAकिसी तरह से 272 का जुगाड़ कर लेती है तो अरुण जेटली सबसे अच्छा विकल्प होंगें।

Tuesday, March 4, 2014

अण्णा- गांधी से गन्ना तक

अन्ना-गन्ना: क्या टिप्पणी लिखी है मित्रवर रवीश कुमार ने! नीचे उनके ब्लॉग से पूरी चिपका रहा हूँ, पढ़िए …

अण्णा- गांधी से गन्ना तक / रवीश कुमार
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आदरणीय अण्णा,

मैं कल्पना करना चाहता हूँ पर कर नहीं पा रहा हूँ । यही कि मोहन दास करमचंद गांधी किसी पार्टी का विज्ञापन कर रहे हैं । कैमरे के सामने टेक रीटेक दे रहे हैं । आप गांधी के बाद लगभग गांधी बनने वाले शख़्स तो बन ही गए थे । मीडिया हमने सबने आपमें गांधी देखा था । आपको भी लगा कि गांधी की तरह आश्रम में रहना चाहिए । आपने राजनीति से दूरी बनाये रखने के असंख्य बयान दिये । कहा कि राजनीति में नहीं जायेंगे । आपके आस पास ऐसे लोग जमा हुए जिन पर आपने यक़ीन किया कि ये भी राजनीति में नहीं जायेंगे । आप राजनीति की तरफ़ गए अरविंद से दूरी बनाते रहे और छकाते रहे । गांधी की हैसियत से सर्टिफ़िकेट जारी करते रहे ।

आज वी के सिंह बीजेपी में जा चुके हैं । किरण बेदी रोज़ मोदी का प्रचार करती हैं । आपके बाक़ी सदस्य क्या कर रहे हैं पता नहीं लेकिन आप तृणमूल कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं । आपको कौन मैनेज कर सकता है । यह ज़रूर है कि आपको मैनेज करने वालों को कोई और मैनेज कर रहा था । आपने वी के सिंह और किरण बेदी को कभी ख़त लिखकर सवाल नहीं पूछा । जनलोकपाल के बदले रूप को जब कांग्रेस बीजेपी अपनी विश्वसनीयता का हथियार बनाने के लिए पास कर रही थीं तब आपके साथ किरण बेदी थीं । आज उसी लोकपाल के लिए बनी सर्च कमेटी को लेकर विवाद हो रहा है । जो आपको नहीं दिखा कि सर्च कमेटी का क्या मतलब है जब सलेक्शन कमेटी मानने को बाध्य नहीं । इसी बिन्दु पर जस्टिस थामस ने सर्च कमेटी के प्रमुख का पद छोड़ दिया । उनका सवाल सर्च कमेटी की प्रासंगिकता को लेकर था मगर बीजेपी ने इसे सरकार की नाकामी बता दी । बीजेपी ने थामस के सवालों का जवाब नहीं दिया । उन्होंने सर्च कमेटी की क्षमता के प्रति अविश्वास व्यक्त किया जिसे कांग्रेस बीजेपी ने मिलकर पास किया था । सरकार और विपक्ष दोनों का गुमान है कि सच वही बोलते हैं ।

आप भी इस विवाद से दूर हैं । चुप हैं । आप अब अण्णा नहीं रहे । बारी बारी से कांग्रेस बीजेपी के काम आने के बाद ममता के कार्यकर्ता बन गए हैं । आपने ख़ुद मैं ही अण्णा तू भी अण्णा के नारे को ख़त्म कर दिया । आप मैं ही अण्णा मैं ही अण्णा जपने लगे हैं । आने वाले दिलों में आप अजित सिंह की पार्टी रालोद या चौटाला की पार्टी इनेलो के लिए भी प्रचार करते नज़र आयेंगे ।

अण्णा आपने गांधी को निराश किया है । आपने जेपी को निराश किया है । उनलोगों को सही साबित किया है जो आपके अनशनों और भाषणों के वक्त हँसा करते थे । आप किस प्रोजेक्ट के तहत तृणमूल के लिए प्रचार कर रहे हैं । आम आदमी पार्टी के आधार में कंफ्यूजन फैलाने का नया मंच है या दिल्ली में प्रचार कर तृणमूल को लिए कुछ वोट बटोरने का प्रयास कर रहे हैं ताकि उसे राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए पर्याप्त वोट मिल जाये या आप ममता के बहाने आप का वोट काट कर मोदी का भला कर रहे हैं । जैसे आप पर आरोप लगता है कि यह बीजेपी को हराने का कांग्रेस का प्रोजेक्ट है वैसे ही कहीं आप आप को हराने के लिए बीजेपी का प्रोजेक्ट तो नहीं ।

वैसे अण्णा आप गांधी से गन्ना बन चुके हैं । सब चूस रहे हैं आपको । चूस चुके हैं । आपको एक सुझाव देता हूँ । आप एक आत्मकथा लिखिये जिसमें सच बोलने का प्रयास कीजिये कि आप कैसे कैसे मैनेज होते रहे । उसका नाम रखिये- गांधी से गन्ना तक । कोई अचानक ब्लागर बनकर मैनेज करता है तो कोई सीडी रिकार्ड करता है । आपने अपना सबसे अचूक हथियार गँवा दिया है। नैतिकता का अधिकार । आपकी टोपी पर सब अपना नाम लिख चुके हैं । किसी रैली में ममता आपकी टोपी उतारकर अपनी टोपी पहना देंगी जिस पर लिखा होगा मैं भी ममता तू भी ममता । टीवी पर आप जिस ममता को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं आप चाहें तो वी के सिंह को भी दे सकते हैं । वे बीजेपी में ही गए हैं । आपके हिसाब से तो अच्छे उम्मीदवार है हीं । बाकी त जो है सो हइये है ।

भवदीय,

रवीश कुमार एंकर

http://naisadak.blogspot.in/2014/03/blog-post_4637.html

Saturday, December 28, 2013

हर कोई राम लीला मैदान के तरफ बढ़ रहा था ऐतिहासिक छड़ का हिस्सा बनाने के लिए- 28 Dec-2012

कल  यानि २८ दिसंबर करीब ग्यारह बजे बस ने  गांधी शांति प्रतिष्ठान के पास छोड़ा। जिसे देखो हर कोई राम लीला मैदान के तरफ बढ़ रहा था ऐतिहासिक छड़ का हिस्सा बनाने के लिए।   ११.२० बजे कई ऐतिहासिक घटनाओं के गवाह उस मैदान में मौजूद था जहाँ कुछ देर बार दिल्ली के सबसे युवा & सातवें मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले थे। पूरा रामलीला मैदान आम आदमी से खचा-खच भरा हुआ था। इसके लिए न तो बसों को किराये पर लाया गया था और न ही रेल गाड़ियों कि बुकिंग की गयी थी लेकिन उमड़ा हुआ जन सैलाब देख कर अनायास ही टीवी पर देखा हुआ १९४७ और जे पी आंदोलन की तस्वीरें याद आ गई फर्क बस इतना है कि वो ब्लैक & वाइट तस्वीरे थी और ये रंगीन।

अलग ही जूनून था।  अलग ही उत्साह था।  इस तस्वीर ने और अरविन्द के मंच से किये गए भराष्ट्राचार के खिलाफ शखनाद ने मौजूदा राजनितिक पार्टियों खासकर बीजेपी में खलबली मचा कर रख दी।  भड़ास तो निकलनी थी  तो सो निकली भी गडकरी के मुह से लेकिन बिना सिर-पैर कि और अब पता चल रहा है अरविन्द का डुलिकेट ढूढ़ा जा रहा है  ताकि एक दिल्ली के बड़े होटल में उसका नाट्य रूपांतरण कि जा सके ।

और आज मुझे इस बात का गर्व है , फक्र महसूस कर रहा हूँ  कि मै २०११ अगस्त क्रांति  ,२०१२  युवा क्रांति  का हिस्सा रहा  हूँ। 

बीते सालों के क्रांतिओं और आम आदमिओं के जूनून ने बता दिया है परिवर्तन हो कर रहेगा।


जय हिन्द, जय आप, जय आम आदमी।    


Saturday, November 2, 2013

जो लोग नेहरू गांधी परिवार को मुस्लिम मानने से इंकार करते है उनके लिए प्रश्न ? नेहरू से पहले ….नेहरू की पीढ़ी इस प्रकार है …. गंगाधर नेहरु राज कुमार नेहरु विद्याधर नेहरु मोतीलाल नेहरु जवाहर लाल नेहरु गंगाधर नेहरु (Nehru) उर्फ़ GAYAS – UD –DIN SHAH जिसे GAZI की उपाधि दी गई थी …. GAZI जिसका मतलब होता है (KAFIR –KILLER) इस गयासुद्दीन गाजी ने ही मुसलमानों को खबर (मुखबिरी ) दी थी की गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड में आये हुए हैं , इसकी मुखबिरी और पक्की खबर के कारण ही सिखों के दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के ऊपर हमला बोला गया, जिसमे उन्हें चोट पहुंची और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी और आज नांदेड में सिक्खों का बहुत बड़ा तीर्थ-स्थान बना हुआ है. जब गयासुद्दीन को हिन्दू और सिक्ख मिलकर चारों और ढूँढने लगे तो उसने अपना नाम बदल लिया और गंगाधर राव बन गया, और उसे इससे पहले मुसलमानों ने पुरस्कार के रूप में अलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में इशरत मंजिल नामक महल/हवेली दिया, जिसका नाम आज आनंद भवन है ….

आनंद भवन को आज अलाहाबाद में congress का मुख्यालय बनाया हुआ है इशरत मंजिल के बगल से एक नहर गुजरा करती थी, जिसके कारण लोग गंगाधर को नहर के पास वाला, नहर किनारे वाला, नहर वाला, neharua , आदि बोलते थे जो बाद में गंगाधर नेहरु अपना लिखने लगा इस प्रकार से एक नया उपनाम अस्तित्व में आया नेहरु और आज समय ऐसा है की एक दिन अरुण नेहरु को छोड़कर कोई नेहरु नहीं बचा … अपने आप को कश्मीरी पंडित कह कर रह रहा था गंगाधर क्यूंकि अफगानी था और लोग आसानी से विश्वास कर लेते थे क्यूंकि कश्मीरी पंडित भी ऐसे ही लगते थे. अपने आप को पंडित साबित करने के लिए सबने नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया गंगाधर नेहरु राज कुमार नेहरु विद्याधर नेहरु मोतीलाल नेहरु जवाहर लाल नेहरु लिखा … और यही नाम व्यवहार में लाते गए … पंडित जवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज तो वो कश्मीर में कांग्रेस का मुख्यालय होना चाहिए जिस प्रकार आनंद भवन कांग्रेस का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में…. ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य कश्मीर में मिल न सकें …. आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है …. चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान मिले, लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे, अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़ आदि बहुत कुछ…. समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान् द्वारा बसाई गई द्वारिका नगरी मिली , करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष मिले तो 150 वर्ष पुराना कश्मीर में नकली नेहरू का अस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ????? 

दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में रखा हुआ है, इस से उभरने के लिए इनको इन सब से भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरे विचार से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टेटर को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य हो जायेगा तो क्या सोचा हम नेहरू को कौनसे नाम से पुकारे ? जवाहरुद्दीन या चाचा नेहरू ? जो नेहरू नेहरू कहते है उनसे पूछिये की इस खानदान के अलावा भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ नहीं हुआ ? अगर यह वास्तव मे ब्राह्मण था तो ब्राह्मनों मे नेहरू नाम की गोत्र अवश्य होनी चाहिए थी ? क्यूँ नहीं है क्यों देश मे और कोई नेहरू नहीं मिलता ? क्या ये जवाहर लाल के परिवार वाले आसमान से टपके थे ? जय भारत जय हो

Monday, October 15, 2012

मीडिया को सूली चढ़ाकर सत्ता की साख बचाने का फर्रुखाबादी खेल


मीडिया को सूली चढ़ाकर सत्ता की साख बचाने का फर्रुखाबादी खेल


कांपती जुबान से जैसे ही रंगी मिस्त्री ने कहा, उन्हें दो बरस पहले कान में सुनने के लिये लगाने वाली मशीन मिल गई थी, वैसे ही देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद खुशी से ताली बजाने लगे। और झटके में मंत्रीजी के पीछे खडे दो दर्जन लोग भी हो-हो करते हुये तालियां बजाते हुये सलमान खुर्शीद जिन्दाबाद के नारे लगाने लगे। यह दिल्ली की उस प्रेस कॉन्फ्रेन्स की तस्वीर है, जिसे डा. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट पर विकलांगों के लिये मिले भारत सरकार के बजट को हड़पने का आरोप लगने के बाद सफाई और सबूत देने के लिये खुद मंत्रीजी ने बुलवाया था। आरोप ने सलमान खुर्शीद की साख पर बट्टा लगाया तो प्रेस कान्फ्रेन्स में सलमान खुर्शीद ने अपने खिलाफ खबर बताने-दिखाने वाले चैनल और इंडिया टुडे ग्रुप के एडिटर-इन-चीफ और प्रोपराइटर अरुण पुरी की साख पर भी यह कहकर सवाल उठा दिया कि रुपर्ट मर्डोक की तर्ज पर जांच होनी चाहिये। सबूत के तौर पर फर्रुखाबाद में अपने गांव पितौरा के कासगंज मोहल्ला के 57 बरस के रंगी मिस्त्री को मीडिया का सामने परोस कर खुद को आरोपो से बरी मान लिया।



तो क्या वाकई सत्ता अब अपनी आलोचना तो दूर अपने खिलाफ किसी भी खबर को देखना-सुनना नहीं चाहती है। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि पहली बार आरोपों का जवाब देने से पहले ही कानून मंत्री ने प्रेस कान्फ्रेन्स के नियम-कायदे यह कहकर तय किये कि वह जो मूल सवाल सोचते है, जवाब उसी का देंगे। और सड़क से उठने वाले सवालों से लेकर मीडिया के उन सवालो का जवाब नहीं देंगे, जिसे वह देना नहीं चाहते हैं। यानी मीडिया जिस खबर को दिखा रहा है, उसके मूल में ट्रस्ट की साख पर फर्जीवाडे का जो बट्टा लगा है, उस फर्जीवाड़े का जवाब और जो सवाल केजरीवाल ने सीधे मंत्रीजी से पूछे उनके जवाब को मंत्रीजी ने पहले ही प्रेस कान्फ्रेन्स के नियम से बाहर कर दिया। हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेन्स में मीडिया के सवालो पर नो कमेंट कहकर बात आगे बढ़ायी भी जा सकती थी।



लेकिन पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेन्स में आजतक के रिपोर्टर दीपक शर्मा के सवाल पर मंत्रीजी ने धमकी दी, नाउ विल सी यू आन कोर्ट [अब अदालत में तुम्हे देखेंगे]। अगर याद कीजिये तो इमरजेन्सी के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेस में जब इंडिया-टुडे के पत्रकार सुमित मित्रा ने इंदिरा गांधी से सवाल किया तो इंदिरा गांधी ने कहा था, मैं एंटी इंडिया पत्रिका के सवाल का जवाब क्यों दूं। इस पर उस दौर में इंडिया-टुडे के एडिटर अरुण पुरी ने बाकायदा कवर स्टोरी की थी, जिसमें देवकांत बरुआ की प्रसिद्द टिप्पणी का जिक्र करते हुये लिखा था इंडिया इज इंदिरा और जो इंदिरा के खिलाफ है वह एंटी इंडिया है। हालांकि इंडिया टुडे की इस कवर स्टोरी के बाद अरुण पुरी इंदिरा सरकार के निशाने पर जंरुर आये। लेकिन कभी ऐसा मौका नहीं आया जब किसी मंत्री ने इंडिया टुडे के रिपोर्टर को सवाल पूछने पर कहा कि आदालत में देख लूंगा। असल में सवाल सिर्फ सलमान खुर्शीद का नहीं है अगर साख के सवाल पर आयेंगे तो सवाल मीडिया से लेकर राजनीति और संस्थानों से लेकर आंदोलन तक पर है। ढह सभी रहे हैं। इंडिया टुडे भी किस स्तर तक बीते दिनों में गिरा, यह कोई अनकही कहानी नहीं है और आजतक ने भी खबरों के नाम पर कैसे तमाशे दिखाये, यह भी किसी से छुपा नहीं है। लेकिन इसी दौर में राजनेताओं और कैबिनेट मंत्रियों को लेकर कैसी कैसी किस्सागोई मीडिया से लेकर सड़क तक पर हो रही है, यह भी किसी से छुपाने की चीज नहीं है। न्यूयार्क टाइम्स ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर रिपोर्ट लिखते लिखते एसएमएस में चलते उस चुटकुले तक का जिक्र कर दिया, जिसमें दांत के डाक्टर के पास जाकर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुंह नहीं खोलते हैं।



जाहिर है इसका मतलब साख अब सत्ता के सिरहाने की चीज हो चुकी है। यानी जो सत्ता में रहे साख उसी की है। राडिया टेप आने के बाद भी सत्ताधारियों की साख की साख पर कोई बट्टा नहीं लगा। और उसमें शरीक मीडिया कर्मी भी बीतते वक्त के साथ दुबारा ताकतवर हो गये और सत्ता के साथ खड़े होने का लाइसेंस पा कर कहीं ज्यादा साख वाले संपादक माने जाने लगे। फिर साख का मतलब क्या अब सिर्फ जनता के बीत जाकर चुनाव जीतना है। क्योंकि कानून मंत्री ने अपने इस्तीफे के सवाल पर उल्टा सवाल यह कहकर दागा कि मैं इस्तीफा देता हूं तो अऱुण पुरी भी इस्तीफा दें। वह भी जनता के बीच जायें। जनता ही तय करेगी कि कौन सही है। तो जिस पत्रकारिता का आधार ही जनता के बीच साख के आसरे खड़ा होता है उसी की परिभाषा भी अब नये तरीके से गढ़ी जा रही है। या फिर चुनाव में जीत के बाद सत्ता संभालते और भोगते हुये राजनेता यह मान चुका है कि साख उसी की है, जो अगले पांच साल तक रहेगी। यानी सारी लड़ाई और सारे संस्थानों की बुनियादी साख को ही राजनीति के पैमाने में या तो मापने की तैयारी हो रही है या फिर अपनी साख बचाने के लिये हर किसी को अपने पैमाने पर खड़ा करने की सत्ता ने ठानी है। हो जो भी लेकिन इस दौर में राजनीतिक की साख भी कैसे धूमिल हुई है यह हेमवंती नंदन बहुगुणा के पोते साकेत बहुहुणा के चुनावी प्रचार और चुनावी हार से भी समझा जा सकता है। साकेत बहुगुणा को जिताने के लिये उत्तारांचल के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपनी और कांग्रेस की सारी ताकत वैसे ही चुनाव में झोंकी जैसे 1982 में हेमवंती नंदन बहुगुणा को हराने के लिये इंदिरा गांधी ने झोंकी थी। याद कीजिये तो मई 1981 से लेकर जून 1982 तक के दौरान इंदिरा गांधी हर हाल में हेमवंती नंदन बहुगुणा को हरवाना चाहती थी। पहली बार जमकर वोटों की लूट हुई तो चुनाव आयोग ने वोट पड़ने के बाद भी चुनाव रद्द कर दिया। दूसरी बार इंदिरा ने तारीखों को टलवाया और जून 1982 में जब मतदान हुआ तो उस चुनाव में बहुगुणा के टखने की हड्डी टूट गई थी। तो देहरादून में बुढिया के होटल से जाना जाने वाले होटल के कमरे में बेठकर ही उन्होंने गढवाल के हर गांव में सिर्फ एक पोस्टकार्ड यह लिखकर भेजा था, टखना टूटने से चल नहीं पा रहा हूं। चुनाव प्रचार करने भी आपके पास नहीं आ पाउंगा। आपके लिये जो किया है उसे माप तौल कर आप देखलेंगे। आपका हेमवंती नंदन बहुगुणा। तो पोस्टकार्ड में वोट देने को भी सीधे तौर पर नहीं कहा गया था। फिर भी 18 जून 1982 को चुनाव परिणाम आया तो बहुगुणा ने कांग्रेस के उम्मीदवार चन्द्र मोहन नेगी को 29,024 वोटो से हरा दिया था। तो सत्ता की ठसक को बहुगुणा ने अपनी उसी साख से हराया जिसे एक दौर में इंदिरा गांधी ने खारिज किया था।



लेकिन अब के दौर में नया सवाल यह है कि साख को लेकर जिस परिभाषा को कानून मंत्री सलमान खुर्शीद गढ़ रहे हैं, उस पर खरे उतरने से ज्यादा संस्थानों को ढहाते हुये साख बरकरार रखने का आ गया है। जाहिर है अऱुण पुरी तो चुनाव लड़ने मैदान में उतरेंगे नहीं और सलमान खुर्शीद पत्रकारिता के मिजाज को जीयेंगे नहीं। तो शायद साख की राजनीतिक परिभाषा को विकल्प के तौर पर सड़क से अरविन्द केजरीवाल गढ़ सकते हैं। क्योंकि इस वक्त इंडिया टुडे की रिपोर्ट और कानून मंत्री के अदालती घमकी के बीच आंदोलन लिये सड़क पर केजरीवाल ही खड़े हैं। और अब दिल्ली के घरना स्थल से उनका रास्ता सलमान खुर्शीद के राजनीतिक शहर फर्रुखाबाद ही जाता है। जहां जाकर वह सलमान को राजनीतिक चुनौती दें। क्योंकि पहली बार जनता को तय करना है की चुनाव में जीत का मतलब ही साख पाना है तो फिर फर्रुखाबाद भी साख की कोई नयी परिभाषा तो गढ़ेगा ही। तो केजरीवाल के ऐलान का इंतजार करें।

 आर्टिकल-पुन्य प्रसून बाजपयी

Wednesday, May 2, 2012

आम आदमी, आन्दोलन और संसद...


 आम आदमी, आन्दोलन और संसद...

बतौर एक आम नागरिक आज-कल जो कुछ हो रहा है उस पर आप सभी क्या सोचते है? आज जो भी अन्ना जी, बाबाराम देव जी  या अरविन्द जी कह रहे क्या उसमे कोई सच्चाई नहीं है? क्या संसद और सांसद की वजह से जनता का वजूद है या जनता की वजह से संसद और सांसद का? क्या जनता सर्वोपरि है या संसद और सांसद. क्या जिस जनता ने अपने शक्तियों को संसद और सांसद में निहित किया है उस जनता को सवाल पूछने या आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है?

सार्वजनिक मंच से जो कुछ भी ये कहा जा रहा है वो केवल उनकी नहीं, ये करोड़ो भारतीयों की है जो इस दूषित राजनितिक और प्रशासनिक व्यवस्था से परेशान हो चुके है. इसकी बानगी पिछले दिनों सड़को पर देखने को मिली. सामाजिक आइना की मूर्ति हमारी फिल्मे भी इसके गवाह है. इस देश के संसद में माननीय अरुण जेटली, कपिल सिब्बल, प्रणब जी जैसे लोग है तो राबड़ी देवी, गोलमा देवी जैसे लोग भी इसी प्रजातान्त्रिक संस्था के हिस्सा रही है. राजनिति या फिर हमारी संवैधानिक संस्थाओ में हत्या, लूट बलात्कार और भ्रष्टाचार के आरोपीओ की कोई कमी नहीं है. क्या ये लोकतंत्र के मंदिर को शर्मिंदा करने के लिए काफी नहीं है?

जो कुछ भी समाज में या देश में ऐसे हालत बने है क्या उसके लिए सभी राजनैतिक पार्टियों के साथ देश के प्रतिनिधि और भ्रष्ट प्रशासनिक व्वयस्था  जिम्मेदार नहीं  है? बिल्कुल! इस देश के तथाकथित माननीय सांसद, उनसे बनी संसद और इनके प्रति जवाबदेह प्रशासनिक व्यवस्था जिम्मेदार है. अगर ऐसी आलोचना सही है तो आलोचना की जानी चाहिए चाहे वो जो कोई  हो.

आम आदमी महगाई, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अव्यवस्था का शिकार है.
सिक्के की तरह सभी चीजो के दो पहलू होते है. अगर समाज में लूट-खसोट है    तो ईमानदारी भी है, झूठ है तो सच भी है, इन्हें पूरी तरह से हटाया नहीं जा सकता है. लेकिन चुनाव सुधार, न्यायिक व्यवस्था में  सुधार, राजनेताओं के लिए एक निश्चित मापदंड जैसी चीजे लाकर सुधार जा सकता है. समाज के लोग अपना कम करे और सरकार अपना. सरकार या माननीय सांसदों द्वारा आम लोगो के नोटिस भेजने के बजाय, भेजे जाने वाले कारणों पर विचार करे तो ये समस्या ही नहीं आयेगी और इससे हमारे संविधान, प्रजातंत्र और संसद की गरिमा बची रहेगी. 


अवधेश कुमार मौर्या
Awadhesh.1987@gmail.com

Wednesday, April 18, 2012

धर्म हमेशा से ही हमरे देश की सबसे बड़ी कमजोरी ...


चाट,पापडी, चटनी और खीर वाले बाबा- निर्मलजीत सिंह नरूला.

भारत एक ऐसा देश है जहाँ आप एक पालीथीन में एक ईट  का टुकड़ा रख कर घूरना शुरू कर दीजिये वहां भीड़ जमा हो जायेगी या फिर सड़क से एक बड़े पत्थर को तिलक लगा कर अगरबत्ती सुलगा दीजिये वही आस्था का केंद्र बन जायेगा. लोगो के इस भोलेपन, पढ़े-लिखे अनपढ़ होना या फिर  आवश्यकता से अधिक विश्वास करने की प्रवित्त का नाजायज़ फायदा उठा रहे है निर्मलजीत सिंह नरूला.

हमारे देश में पैसा कमाना बहुत आसान है बस आपके दिमाग में एक शातिर खुराफात होनी चाहिए और निर्मल उर्फ़ कथाकथित बाबा उसी खुराफात की देन  है. धर्म हमेशा से ही हमरे देश की सबसे बड़ी कमजोरी रही है, धर्म की आड़ में ये व्यापार हो रहा है.धर्म के नाम पर लोगो को गुमराह किया जा रहा है. किसी चीज़ में आस्था ठीक होती है लकिन अन्धविश्वास नहीं. धर्म के नाम  पर लोगो को बरगलाने की कोशिश की जा रही है.

सरकार के आखो के सामने जनता को मुर्ख बनाया जा रहा है. ये बाबा जो लोगो को चाट, पकौड़े, आचार और गुलाब जामुन खा कर कृपा बरसने की बात कर रहे क्या उसका कोई बैज्ञानिक, वैचारिक या अध्यात्मिक आधार है.

ऐसी भ्रम और अंधविश्व फ़ैलाने वाली मानसिकता को जल्द से जल्द बंद कर देना चाहिए.सभी लोगो इस प्रकार के घटिया मानसकिता बाले चीजो को बढावा नहीं देना चाहिए.

अवधेश कुमार मौर्या
awadhesh.1987@gmail.com

Friday, April 6, 2012

एक आम नागरिक भी कर सकता है जन शिकायत आयोग में पुलिस के खिलाफ शिकायत


एक आम नागरिक भी कर सकता है जन शिकायत आयोग में पुलिस के खिलाफ शिकायत

जन शिकायत आयोग (Public Grievances Commission)

एम-ब्लाक, विकास भवन , नई दिल्ली- 110002

फोन- 23379900  23379901
website- www.pgc.delhigovt.nic.in
Email- pgcdelhi@nic.in, pca.delhi@nic.in

अगर आप को किसी दिल्ली पुलिस के खिलाफ गंभीर दुर्व्यवहार की कोई शिकायत है तो आप भी जन शिकायत आयोग का दरवाजा खटखटा सकते है

इसमें कई चीज़े आती है

-पुलिस हिरासत में मृत्यु
-पुलिस के कारन लगने वाली चोटे
-बलात्कार या बलात्कार के प्रयास
-गैर क़ानूनी हिरासत या  उत्पीडन
-भूमि/मकान हड़पना या प्राधिकरण का कोइ अन्य गंभीर दुरूपयोग

यह व्यस्था केवल दिल्ली और एन सी आर, में लागू है.  आशा करते है ये व्यवस्था पूरे देश में लागू होगी ताकि आम लोगो को अनावश्यक पुलिसिया उत्पीडन से बचाया जा सके.

कृपया आम लोगी को इससे परिचित करने के लिए, और इस कानून के प्रति जागरूक बनाने के लिए इसे शेयर करे.  

Wednesday, April 4, 2012

खबरों को रफ़्तार देने के चक्कर में समाचार को बना दिया खो-खो और कब्बड्डी का खेल.

खबरों को रफ़्तार देने  के चक्कर में समाचार को बना दिया खो-खो और कब्बड्डी  का खेल.

शायद दूर-दराज़ के गावों या शहरो के लोगो के इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं होगा कि शहरी लाईफ इतनी व्यस्त या भागम-भाग भरी होगी. इस बात का एहसास मुम्बई रेलवे स्टेशनों या फिर दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों पर भागती दौड़ती जिंदगी को देख कर लगाया जा सकता है .

लेकिन इन सब से इतर एक और चीज़ है जो इस बात का एहसास कराती है, वो है हमारे न्यूज़ चैनलों में दिखाए जानो वाले खबरों की रफ़्तार. या फिर यूँ कहें कि लोगो की भागती- दौड़ती ज़िन्दगी और उनमे समय के अभाव के नब्ज़ को चैनलों ने पकड़ा. क्योंकि ज्यादातर न्यूज़ चैनलों के प्रोग्राम शहरी दर्शको को फोकस करके बनाये और दिखाए जाते है. पिछले दो सालो में न्यूज़ चैनलों के कंटेंट में ज़रूर सुधार  आया है क्योंकि समाचारों से विपरीत दिखाई जाने वाले चीज़े समाचार चैनलों के अस्तित्व को नकार रही थी या उन पर एक सवालिया निशान लगा रही थी. 
  
            लेकिन चंद महीनो में जो सबसे बड़ा बदलाव आया वो है न्यूज़ चैनलों में खबरों की रफ़्तार. सभी के सभी चैनल चाहे वो बड़े ब्रांड हो या छोटे चैनल सब के सब खबरों को  रफ़्तार देने के चक्कर में पड़े है कुछ वैसे ही जैसे बचपन में हम और आप खो-खो और कब्बड्डी  का खेल खेलते थे. 

जब कि आज भी मीडिया संस्थानों में समाचारों के सिद्धांत में यही पढाया जाता है एक आईडियल स्टोरी एक से डेढ़ मिनट की होती है. लेकिन कोई चैनल 5 मिनट में पचास तो कोई 15 मिनट में दो सौ खबरें. यानि समाचारों के नाम केवल और केवल हेडलाइने ही बची है.

इसकी शुरुआत सबसे पहले टी वी टुडे नेटवर्क के चैनल तेज ने किया. उसके बाद से इसकी होड़ सी मच गयी. सबसे बड़ी बात यह कि  इससे न्यूज़ चैनलों के टी आर पी में इजाफा भी हुआ. और टी आर पी के दौड़ में वो  चैनल पीछे जो इस ट्रेंड अपना नहीं सके या फिर अपनाने में देरी कर रहे है. हा ये ज़रूर है कि अभी इंग्लिश इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी इससे दूर है.

आज कोई  राजधानी या शताब्दी के रफ़्तार से खबरे दिखा रहा है तो कोई बुलेट की रफ़्तार से भी तेज़,  तो कोई दुनिया का सबसे तेज बुलेटिन दिखा रहा है. पता नहीं इसके मापने का पैमाना बनाया क्या  होगा. बस टीवी स्क्रीन पर उभरते दो चहरे और फटा-फटा खबरे. और अंत में, आप लोग इस आर्टिकल को पढ़ क्या सोच रहे होगे लेकिन मेरा नजरिया अभी भी सकारात्मक है और उस दिन के इंतजार में हूँ जब हम और  आप रॉकेट, मिसाईल,  ध्वनि और प्रकाश की गति से भी तेज़  रफ़्तार से खबरे देखेगे.


अवधेश कुमार मौर्या,
नई दिल्ली,
awadhesh.1987@gmail.com

Tuesday, March 27, 2012

सवाल : कानून संविधान के मुताबिक संसद में बनते हैं वह संसद ही बनाएगी.

सवाल : कानून संविधान के मुताबिक संसद में बनते हैं वह संसद ही बनाएगी. 

ऐसा सवाल खड़ा करके हमारे राजनेता जनता की दिशाभूल कर रहे हैं. हमने एक बार नहीं सैंकडों बार कहा है कि संविधान के मुताबिक कानून संसद में ही बनते हैं. लेकिन लोकशाही यानि जनतंत्र अथवा प्रजातंत्र में कानून का मसौदा(ड्राफ्ट) बनाना है तो वह समाज के अनुभवी लोगों को लेकर, सरकार ने बनाना है. ऐसे मसौदे को इंटरनेट और दूसरे माध्यमों के ज़रिए देश की जनता के सामने रखा जाना चाहिए. जनता उस ड्राफ्ट को पढ़ेगी, कुछ कमियां दिखाई देंगी तो जनता सुझाव करेगी. जनता से मिले सभी सुझावों को लेकर संसद में रखा जाना चाहिए.
लोकशाही का मतलब है लोगों ने, लोगों के लिए, लोगों के सहभाग से चलाई हुई शाही. वह है लोकशाही? डा. बाबा साहब अंबेडकर जी ने संविधान को संसद में रखते हुए पहला शब्द दिया था – ”हम भारत के लोग”. २६ जनवरी १९५० में देश में प्रजा सत्ता का दिन मनाया गया. उसी दिन से जनता इस देश की मालिक हो गई. सरकारी तिजोरी में जमा होने वाला पैसा जनता का पैसा है. इस तिजोरी में से सरकार जो पैसा जमा या खर्च करती है उसका हिसाब किताब जनता को देना ज़रूरी है. कारण कि यही प्रजातंत्र है. उस पैसे के ऊपर जनता का कोई नियंत्रण न होने के कारण और उसका हिसाब किताब जनता को न दिए जाने के कारण भ्रष्टाचार बढ गया है.
जनता इस देश की मालिक है. संविधान के माध्यम से प्रतिनिधि लोकशाही को हम भारतवासियों ने स्वीकार किया है. राज्य की विधान सभा में जनता अपने प्रतिनिधि के रूप में, अपने सेवक के रूप में, विधायक को भेजती है और लोकसभा के लिए सांसद को भेजती है. संविधान कहता है कि जनता के सेवकों को जनता के विकास के लिए उनके पैसों का सही नियोजन करना है. इसलिए लोकसभा और विधानसभाओं को कानून बनाने हैं. लेकिन जनलोकपाल जैसा बिल आठ बार लोकसभा में आकर भी पास नहीं किया गया.
कानून लोकसभा में बनते हैं यह बात बराबर है लेकिन आठ बार लोकसभा में आकर भी बिल पास नहीं हुआ इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? जनता इस देश की मालिक है और मालिक ने अपने सेवकों को भेजा है. सेवक जब कानून नहीं बना रहे तो मालिक होने के नाते जनता को पूछने का हक है कि जनलोकपाल कानून क्यों नहीं बनाया गया?
हमारा संविधान अस्तित्व में आए ६३ साल बीत गए. लेकिन जनता देश की मालिक है और हम जनता के सेवक हैं यह बात इन सेवकों को समझ में नहीं आई. यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात है. किसी दफ्तर में नागरिक अपने काम करवाने जाते हैं और कुछ पूछ लें तो कहा जाता है कि आप पूछने वाले कौन?”. जिस प्रकार जनप्रतिनिधियों को हम जनता ने अपने सेवक के रूप में भेजा है उसी प्रकार राष्ट्रपति जी ने जिन आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस. जैसे सनदी अधिकारियों का चयन किया वह भी गवर्नमेंट सरवेंट हैं. जनप्रतिनिधि एवं सभी सरकारी सेवक जनता के सेवक हैं. हमसे पूछने वाले आप कौनऐसा कह कर ये लोग संविधान का अपमान कर रहे हैं.
अंग्रेज़ जुल्मी था. उसे भारत को लूटना था. इसलिए उसने अपनी मनमर्जी से कानून बनवाए और देश की जनता पर अन्याय व अत्याचार करता रहा. इस तरह वह नाजायज और अमानवीय कानून के आधार पर भारत को लूट ले गया. अब हम प्रजातंत्र में हैं. गणतंत्र में हैं. लोकशाही में हैं. अब कोई भी कानून बनाना है तो उसका ड्राफ्ट बनाते समय जनता के अनुभवी लोगों को साथ में लेकर ही ड्राफ्ट बनाना है. और तब कानून बनाने के लिए उसे संसद में भेजना है. मैं उम्मीद करता हूं कि राजनीति के लोग इस बात को समझेंगे.

Monday, February 27, 2012

लोकतंत्र के मंदिर में ब्लू फिल्में देखते हैं:


सांसदों के खिलाफ अपनी टिप्पणी के लिए राजनीतिक दलों और नेताओं की आलोचना का सामना कर रहे  अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद और विधानसभाओं में इसके सदस्य ब्लू फिल्में देखते हैं, विधेयक फाड़ते हैं और एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकते हैं.


''भारत में पार्टी आलाकमान की तानाशाही होती रही है. लेकिन अब इसे सही मायनों में जनता का जनता के लिए शासन बनाने का समय आ गया है.''''इस संसद में ऐसे 15 सांसद हैं जिन पर हत्या करने के आरोप हैं, 23 ऐसे सांसद हैं जिन पर हत्या के प्रयास के आरोप है, 11 सांसदों के खिलाफ धारा 420 के तहत धोखाधड़ी करने और 13 के विरुद्ध अपहरण के मामले दर्ज हैं.

''उत्तरप्रदेश में पार्टियों ने ऐसे पांच लोगों को चुनाव में खड़ा किया है जिन पर बलात्कार के आरोप हैं. क्या हम इन लोगों से उम्मीद करें कि वे भारत को भ्रष्टाचार और अपराध से मुक्त कराएंगे.''

अरविंद केजरीवाल

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/02/120227_kejriwal_bluefilms_sdp.shtm

Thursday, August 27, 2009

युवा होने का मतलब है .........?


युवा होने का मतलब .......?


क्या युवा होने का मतलब सिर्फ़ 18-40 की उम्र का होना है या फिर उसके लगन,संघर्ष,हौसले या फिर उसकी नई सोच से लगाई जानी चाहिए जो किसी भी चीज़ को अपनी ताक़त और सोच के बदौलत सही दिशा मे मोड़ सकता है। दरअसल ये सवाल इसलिये उठ रहे हैं कि आज के समय मे युवा होने की मायने बदल गये हैं। युवा होने का मतलब आधुनिक होती जीवन शैली, झूठी शानो-शौकत या फिर दिखावे की ज़िंदगी से हो गया है।


दरअसल वैश्वीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया से पूरी दुनिया मे जो सामाजिक और आर्थिक बदलाव आये, उसने युवाओं की सोच को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। जाहिर है कि  इससे हम यानी भारत के युवा भी अछूते नही रहे। पश्चिमी देशों की तर्ज़ पर हमारे यहाँ भी उनका क्लोन तैयार हो रहा है जो मंदिर जाने के बजाय पब, क्लब और डिस्को मे जाना पसन्द करता है। ग्लैमर और फैशन की चकाचौंध में आकर अपने अस्तित्व को  खोता जा रहा है। संस्कारों, मर्यादाओं और आदर्शों को रौंदते हुये बनावटी सपनों को पाने की ललक इतनी तीव्र हो चुकी है कि पारिवारिक रिश्तों का विखण्डन या फिर उन्हे ताक पर रखना कोई मयाने नही रखता, लिहाजा युवाओं के सोचने, समझने और देखने के नज़रिये मे व्यापक बदलाव आया है और मानसिकता हर प्रकार संबन्धों और रिश्तों को स्वार्थ भरी नज़रों से देखने की बन गई है। 


वैश्वीकरण वैश्वीकरण और हमारी बदलती हुई मानसिकता की वजह से आज की ज़रुरते, रोटी , कपड़ा कापी किताब से इतर सेलफोन, इंटरनेट और फिल्में मे स्थानात्तरित हो गई है और इन सब चीजों में इतने तल्लीन हो गए है कि उचित और अनुचित के बीच का फर्क लगभग समाप्त हो गया है। यही वजह है कि पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की बागडोर लगातार दरकती जा रही है।


परिवेश को युवा पीढी़ के प्रागतिशील सोच, विचार के अनुरूप ढ़लना चाहिये न कि युवाओं को इसके अनुरूप ढ़लना चाहिये । वर्तमान परिवेश ने युवाओं को इतना अभिलाषी बना दिया है। हसीन सपनों को पूरा करने कि लिये तरक्की के शॉर्ट कट रास्ता भी अपनाने से नहीं हिचकते है और चाहत उन्हे अपराध की दुनिया मे घसीट रही है। ज़िन्दगी को सिगरेट के धुएं के छल्ले में उड़ायें जा रहे हैं. जल्दी क़ामयबी की आस मे रिश्तों को को भी ताख पर रखने  से बज नहीं आते. इस हाय बाय और कम्पयूटर वाले युग मे ज़रुरत इस बात कि है आधुनिक होती जीवनशैली और हमारे जो मूल्य हैं उनके बीच एक सन्तुलन क़ायम रखा जाय। हमे इस बात को भी समझ लेना चाहिये कि यह सब चीज़ें कभी भी देश के विकास और खु़द के तरक्की के पर्याय नही बन सकते हैं।


बेशक उदारीकरण ऐसी चीज़े हैं जिससे देश या समाज अछूता नही रह सकता है। लेकिन ऐसा भी नही है कि इसके बिना नही रहा जा सकता। ज़रुरत इस बात कि आधुनिकता का दामन छोडे़ बिना अपनी मौलिकता, अपनी पहचान को बनायें रखें वैसे भारत की पहचान ही आधुनिकता और परम्पराओं को साथ लेकर चलने वाले देश से होती है। वास्तव मे यहीं हमरी असली पहचान भी है। और अन्त मे "युवा ही हमारी असली ताक़त है"।


"राहें दुश्वार भी हो सकती है सफ़लता के मंजिल के लिये
हमको फिर भी गिर-गिर कर संभलना होगा।
वक़्त चाहेगा काँटों पर भी चलेंगे,
हमे अपनी हिम्मत से जमाने को बदलना होगा.
मंजिल पाने की दिल मे ऐसी कसक कि
हम जो चाहे तो पत्थर को भी पिघलना होगा।"

aapkiawaj.blogspot.com




Tuesday, May 5, 2009

क्या लोकतंत्र को बदलने कि जरुरत है .........

सही मायनो में लोकतान्त्रिक व्यवस्था अब नकारा साबित हो चली है और इसे बदलने की ज़रूरत है ...

कुछ भी हो हर एक चीज की एक उच्चतम अवस्था होती है। कभी न कभी उसका अस्तित्व ख़तरे मे पडता है।कारण चाहे जो कुछ भी हो। मुम्बई में 26/11 की घट्ना के बाद जिस तरीके से हज़ारों लोग सड़को पर उतरे , अपने आक्रोश को जाहिर किया। ऐसा लगा वे राजनैतिक तौर पर या इस देश का जिम्मेदार नागरिक के नाते सत्ता या फिर राजनैतिक व्यवस्था मे एक बद्लाव को देख्नना चाहते थे या लाना चाहते थे , जो वास्तव मे मौजूदा दौर के राजनीति की ज़रूरत है। शायद क्षणिक ही सही लेकिन वे पल राजनीति को आईना दिखाने की कोशिश भी थी।

लेकिन ये सारी की सारी चीज़े धरी की धरी रह गई जब मुम्बई मे मतदान का % ( 45%) सामने आया। जो कि अत्यंत निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाला था । मुम्बई घटना के बाद लोगो मे जो एक परिवर्तन की किरण जगी थी वो कहीं लोगों के लोकतन्त्र के महापर्व यानि चुनाव के प्रति अविश्वास के उजाले मे खो गई। दरअसल यह समाज का वो तबका जो पढ़ा- लिखा है,समाज मे रहता है ,लेकिन सामाजिक जीवन, वोट की ताक़त और लोकतन्त्र के मायने नही समझता। 



समाज से बिल्कुल कटे हुये, ये लोग इन्डिया के नागरिक है न कि भारत के। ये लोग फ्लड लाईटों के रोशनी में ऎतिहासिक ईमारतों पर मोम्बत्तियां तो जला सकते है लेकिन धूप में मतदान नही कर सकते। अगर मतदान के मामले में भारत और इन्डिया का मुक़ाबला हो तो निश्चित तौर पर भारत की ही जीत होगी। यानी हिन्दुस्तान मे लोकतन्त्र जीवित है तो भारत के भरोसे न कि इन्डिया की बदौलत।

तो क्या इसका मतलब ये समझा जाय कि वोट करना शैक्षिक, आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों की निशानी है? या फिर सही मायनो में लोकतान्त्रिक व्यवस्था अब नकारा साबित हो चली है और इसे बदलने की ज़रूरत है ?



Awadhesh kumar Maurya 
awadhesh.1987@gmail.com

Sunday, April 26, 2009

कहां गये हमारे वो नेता……







कहां गये हमारे वो नेता……
एक कहावत है हमाम मे सभी नंगे है। कोइ भी दूध का धूला नही है। पहले राजनिति मे ऐसे लोग आते थे जो क्रान्तिकारी थे या वे लोग जिनके पास एक सामाजिक सोच थी, वे देश और देश की ग़रीब जनता के लिये कुछ करना चाहते थे।वो भी एक दौर था आज भी एक दौर है।समय तेजी़ से बद्ला है साथ ही राजनिति का स्वरूप भी। सत्ता के शीर्ष से लेकर नीचले पयदान तक सभी एक रंग मे रंगे हुये हैं। चाहे बात प्रधानमंत्री की हो या लाल कृष्ण आडवाणी की या फिर किसी भी राजनितिक दल के कार्यकर्ता की हो, सभी पर दूषित राजनीति हावी है।

वर्तमान मे नेता होने का मतलब है शाही रुतबा. लोगों के बीच नेता जी का ख़ौफ़, और साथ ही अपराधिक प्रवति का होना भी नेता जी की एक ख़ास पहचान है और राजनीति का मतलब है कौन,किससे अधिक से अधिक से अशब्द या अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर सकता है और एक दूसरे से नीचा दिखा सकता है। आज के नेताओं के बीच इस बात की होड़ चल रही है कि कौन ज़्यादा से ज़्यादा जहरीले, उत्तेजक भाषणों के जरिये जन भावनाओं को भड़का सकता है। राज ठाकरे , वरुन गांधी और आदित्यनाथ जैसे नेता इनके उदारहण भी है। तू तू मैं मैं की इस राजनिति मे याद आती है आज लालबहादुर शास्त्री, जवाहर लाल नेहरु. और अटल बिहारी जैसे नेताओं की। इनमे से मैने केवल अटल जी को बोलते हुये सुना है। उनकी भाषण शैली , बोलने की कला लाजवाब थी। उसका लोगों पर गहरा असर पड़ता था। लोग घण्टों भी खड़े रहकर उनको सुनते थे। लेकिन आज के नेता तालियां तो बटोरते है उनके भाषणों का जनमानस के उपर कोइ भी असर दिखाई नही पड़ता।

 इन सब का परिणाम यह हुआ है कि राजनीति का स्तर बहुत तेज़ी से गिरा है।राजनिति का लगातार नैतिक पतन होता जा रहा है यही कारण है कि आज राजनीति को अच्छे नज़रिए से नही देखा जा रहा है। खा़सकर युवा तो कत्तई इसमे नही आना चाहते। इससे राजनिति मे वंशवादी परम्परा को भी बढ़ावा मिल रहा है। इन सब के बीच सवाल यह भी उठता है कि देश के सामाजिक पतन के लिये क्या राजनैतिक पतन ज़िम्मेदार नही है? लेकिन इन सब के बावज़ूद आज ऐसे भी नेता है जो है जो मुदों की बात करते है , ऐसे माहौल मे रहअकर भी अपने कर्तब्यों को नही भूले हैं। उमर अब्दुल्लाह , सचिन पायलट , राहुल गांधी जैसे अनेक नेता है जो जो मौज़ूदा दौर के राजनीति को आइना दिखाने की कोशिश कर रहें है।

इन सब के बीच हमें यह नही भूलना चाहिये कि आख़िरकार राजनीति के मंजिल का रास्ता हमारे ही समाज के गलियारों से होकर गुजरता है।राजअनीति मे भ्रष्टाचार और नेताओं की मौकापरस्ती के लिये केवल नेता ही जिम्मेंदार नही हैं।कहीं न कहीं तो हम भी उसके लिये जिम्मेदार है। अच्छी सोच रखेन रखें और अच्छे नेता चुने।

Awadheh Kumar Maurya 
Awadhesh.1987@gmail.com

Thursday, April 23, 2009

हमारी धरती और पर्यावरण- हमारी पृथ्वी प्रकृति की अनमोल धरोहर है.....



क्या वास्तव मे हम अपने शहरो, गांवो , नगरों या फिर एक नयी दुनिया का निर्माण कर रहें हैं। देख्नने या सोचने मे जितना हक़ीकत लगता है वास्तविकता इससे कहीं अलग है। लोग इस पर अलग अलग राय रख सकते हैं । एक तरफ़ हम किसी चीज़ को बनाते हैं तो दुसरी तरफ़ हम विकास कि सम्भावनाओं को ख़त्म कर देते हैं। 


इस भौतिकतावादी युग में लोग बिना सोचे समझे वस्तुओं का उपभोग कर रहें हैं। कल 'earth day' इस बात का एहसास कराने के लिये की हमारी धरती ख़तरे में है। मीडिया ने भी अपने - अपने तरीक़े से लोगों मे एक अलख़ जगाने की कोशिश की। आज के दौर मे अधिकतर लोग जागरुक है लेकिन कर्तब्यनिष्ठ नही। समस्यायें सामने इसलिये भी सामने आती है क्योंकि उनको ये पता नही कि आख़िर शुरुआत कैसे करें? कहां से करें। यह भी हमारे देश का दुर्भाग्य और अजीब विडंबना है कि जो लोग सोचते हैं वो कर नही सकते लेकिन जो करने लायक है (हमारे देश के नेता) वो कभी सोचते नही। इस देश में ऐसे लोगों की कमी नही जो अपने भोग विलासी जीवन मे ही खोये रहते हैं या फिर कुछ ऐसे होते है पानी पीने के लिये हर रोज़ एक नया कुआं खोदते है यानि पूरा का पूरा दिन दो वक़्त की रोटी कमाने मे ही निकल जाता हैं। 

समाज का हर तबका सभी चीज़ों को उपभोग के नज़रिये से देख़ने लगा है शायद यहीं कारण है की आज धरती और प्रकृति अपने अस्तित्व को बचाने के लिये संघर्ष कर रही है।


भारत विभिन्न सभ्यताओं , संस्कृतियों और प्राकृतिक विविधताओं से भरा हुआ एक प्राचीन देश है। यहां के जंगल, पहाड़ और इसमें बसने वाले जीव जन्तु हमारी अनमोल धरोहर और प्राकृतिक विरासत है । लोगों ये नही मालूम हमे जीवित रहने के लिये जितना ज़रुरी रोटी , कपड़ा मकान की होती है उससे कहीं ज़्यादा इन सभी प्राकृतिक धरोहरों की ।हमें इन सभी को बचाकर रख्नना है इनके बिना ख़ुद के जीवन की कल्पना मुश्किल है। इसकी शुरुआत खु़द के घरो या पास पड़ोस से कर सकते हैं।



भौतिक वस्तुओं का उपयोग और उपभोग कम से कम करें या फिर अति आवश्यक्ता पर ही करें ।
अधिक से अधिक पेड़ - पौधों को लगायें और साथ ही जंगलों को कट्ने से बचायें।
प्राकृतिक वस्तुओं का सदुपयोग करें न कि उपभोग या फिर दुपर्योग।

Awadhesh kumar maurya
awadhesh.1987@gmail.com